कितनी देर अपने से दूर रहूँ
अपनी देह में रहते हुए
दूसरे की पहचान ओढ़ कर
अपने को कुचलता रहूँ
कितनी देर बाद
यह जान पाया तुमसे मिलने के बाद
कि देह तो मेरी है
पर मुझमें साँस लेता कोई और है
इतनी देर हो गई दोस्त
की अब ये जान लेना ही
मेरे दुःख का कारण है
न कि
अपनी देह में रहते
दूसरो को अपने में जीना ///