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Tuesday, September 22, 2009

अलगाव

भय से निकल
आत्मविश्वास की दुनिया में
अपने को ले जाता हूँ
अजनबी सा वहाँ धोडी देर खड़ा रह
तुंरत लौट आता हूँ /

इस --अपनी प्यारी
फरेब की दुनिया में --
जहा भय है
मगर मेहनत नही
जहा झूठ है मगर सत्य नही
जहा जोखिम है हर पल
मगर भूख नही
जहा पहचान है
हम आतंकियों ,चोरों ,का एक बड़ा समाज है /

वह दुनीया--
इतनी कहा आबाद ?
और कहा इनका समाज ?
सब अजनबी बेगाने से रहतेहमेशा अकेले
अपने अपने सत्य के साथ
चमकते रहते
अपनी ख़ुद की रचाई दुनिया में /


नही, में नही छोड़ जाऊंगा
अपनी दुनिया को -
पत्ता है मुझे
इसका अंत
मगर जब तक जिऊंगा,
भय से जिउ चाहे
ऐशो-आराम से जिऊंगा//

अफ़सोस
इन
विचारों का मेरे
जिसने भी किया विरोध
वो मेरे ही समाज का नामी -गरामी निकला /

वे त्तो चुप्पी धरे
हमेशा रहते तटस्थ ...
यों उनका अलगाव !
क्या ...?
किसी खतरे का है आगाज ////