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Monday, January 30, 2012

खूब निभाया उसने

सब कुछ गणित के सूत्रों की तरह तयशुदा था 
पता था की गुना ,भाग ,जोड़ ..करके कई देर बाद 
कब खुदको घटा देना है इस समीकरण से 
प्रेम की प्रमेय का ये अद्भुत ज्ञान 
उसको अपनी विरासत में मिला था 
जिसे खूब निभाया उसने 
अद्भुत  गणित था उसका 
अपनी विरासत को वो नयी प्रमेय दे गयी 
जिसको पाय्थोगोरस भी सुलझा नहीं पाता
 अब जब सब कुछ झुलस गया है 
एक अद्भुत सन्नाटे में विद्यार्थी हस रहा है 
खुद पर ...आन्सुवों के समुंदर में डूबा उसका चेहरा 
अब शायद निकाले बाहिर
उसको उलझनों से ,अवसाद से 
हाँ ,शायद--- अब वो पहचान गया है 
कहाँ , क्या--किसे  समझने में उससे भूल हुई  थी ....

Wednesday, January 25, 2012

जय हिंद !!!!!

लोक तंत्र के  मायने 
बहुत समझाए उन्होंने 
जिनको खुद नहीं मालूम 
लोक क्या बला  है 
तंत्र में बने रहने की कोशिसे 
लोक को भूलने के लिए करती है मजबूर शायद 
या वे जानते  है 
जो ज्यादा भावुक हुए 
ज्यादा ही लोकतान्त्रिक हुए 
मिलेगी नहीं दो जून की रोटी भी 
ये गाडिया ,हवाई यात्राएँ ,बंगले ,वैभव 
पीछे लोगो की अथाह भीड़ 
दोनों में से किसी एक को चुनना है 
और आज गणतंत्र दिवस है 
मैं यू करू 
फहरा  दूँ  पाया झंडा 
गाऊ राष्ट्र गान ,जाऊं शहीद स्मारक 
गुण गान करू स्वतंत्रता सेनानियों का 
और फिर गाडी में बैठ 
पहुँच अपने बंगले 
वो सब करू जिसकी इज्जाजत नहीं देता सविंधान 
और बना रहू इस कुर्सी  पर 
फिर फेह्राने झंडा .......
सब साथ बोलो जोर से बोलो 
जय हिंद !!!!!



Sunday, January 22, 2012

तुम आई हो

बहुत अन्धकार में 
हाथ को न सूझे जहा हाथ 
प्यार मेरा उसको थामता है 


दबी हुई रुलाई 
हंसी में बदल भौचक हो जायेजैसे 
इस अकेले अँधेरे  में 
तुम आई हो 
एक गूंज की मानिंद 

निर्जन इमारतमें
हरक़त होने लगी है 
बरामदे ,अहाते ,झरोखे ,जालियां 
गुम्बद ,तहखाने ,शयन कक्ष 
खुस्फुस्साते है हमें 
भूलकर अपनी कहानिया 

रोशन हुआ है
हर कोने फिर प्यार 
थामे रखना हाथ 
और घना करना अँधेरा 
चाँद तुम भी छुपे रहना 
इस अमावस जो फूटी है कोंपल 
वो बने कदम्ब का  वृक्ष 
जहां  मिलते रहे कान्हा 
फिर फिर राधा से ....



Saturday, January 21, 2012

ये पाट नदी का

विरह की धुंध से निकल 
मिलन की उजली सुबह 
पहुँच ही गया जल 
फिर नदी में कलकल 
छलछल नाचता फांदता 
अपने उदगम से यू निसरता
जैसे सितार से ,किसी बांसुरी से 
उस्ताद के तबले से 
कुमार गन्धर्व के मुह से 
निसरती हो राग
जानता है  वाध्य  यन्त्र  
जानता है गायक 
ये राग फिर बिछोह की ओर 
ले जायेगी  फिर सिमटेगी ये राग 
यन्त्र में ,गले में क़ैद हो जायेंगे 
फिर ये सुर ..खतम हो जाएगा ये गान 
बचेगा झनझनाता ,कंपकंपाता ये समय 
संवेदनाओं को जगाता 
ये नदी भी जानती है 
समां जायेगी फिर समद्र में 
रह जाएगा रह रह आहें भरता ठंडी 
ये पाट नदी का ......

Friday, January 13, 2012

बदल गया हूँ रस्सी में

तन गयी है बात
जैसे तन जाती है बंदूकें
बात के एक छोर वो है
बात के दूजे छोर भी वो है
में दोनों छोर से दूर
तनती हुई बात का साक्षी बना हूँ
आधी रात के इस अँधेरे
बदल गया  हूँ रस्सी में
जिसका तनाव मुझे दोनों छोर से खींचे जा रहा है
अब बात के दोनों छोर  मैं  हूँ
 मेरी देह उस तनाव में गुंथती जाती है
वो दोनों अब सिर्फ साक्षी है
 और बात -- किसी और ठिकाने को तलाशने
निकल पड़ी है ..........

Thursday, January 12, 2012

भर गया मुझमे वो पानी

कोहरा आकार ले रहा है
आकार  वजूद खो रहे है
पानी कभी बर्फ ,कभी भाप
कभी नदी कभी सागर कभी आकाश
कभी मानवीय आकार में
रंगहीन मगर सारे रंग तय करता है
पानी की जुबान नहीं कोई मगर
बिन पानी शब्दों में पथ्थर बोलता है
आंखे जो खो दे पानी
जीवन में छा जाता  अँधेरा
तेरे और मेरे बीच ये पानी ही है
जो प्यार बन बोलता है
तू मुझमे और में तुझमे
कई रूपों में पानी बन ही डोलता है
छट गया है कोहरा
भर गया मुझमे वो पानी
जो गीत बन मुझको गाता है
ये कोहरा हमेशा मुझमे यू तुझको
फिर फिर छोड़ता है .......

Sunday, January 8, 2012

जीवन ज्योति

रंग पुराने नए होकर आते है
भाव वही नए चित्रों में नयी कविताओं में ढलते है
समय वही नए क्षणों में नए चेहरों की मुस्कान लिए सजते  है
जैसे  बरसात में नदी  सूखे पाट को अपना  नाम दे जाती है
मेने भी लिया है नाम ,मैंने भी दिया है नाम ,बहा हूँ ,बह  रहा हूँ
आकाश सोख रहा है  ,अवसाद ,बिछोह ,उतेजना ,क्रोध
और रोज होता जाता है नीला ,बिखेरता जाता है धरती पर तमाम खुशिया
बहारो से झूमती धरती ,चहकती है ,चिड़िया की मानिंद
में भी झूमता हूँ ,मुस्कुराता हूँ ,गाता हूँ
इस जीवन ज्योति से अपनी ज्योत जगमगाता हूँ ....