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Monday, August 18, 2014

उसकी ही याद में

वीणा का हर तार बजने लगा
मौसिम जो ऐसा था
और मुझ पर प्रेम की नज़र भी डाली थी उसने
मुझसे निसरी थी राग
बिन बांसुरी स्वरलहरियां नृत्य करने लगी
और बज उठा हर तार वीणा का
स्पंदन प्रेम का झंकृत कर गया समय को
इतनी ऊर्जा और उल्लास दे गया
कि आज  भी उसकी  ही याद में
रचित हो रही
फिर ,फिर, दुनिया ...................................राकेश मूथा 

Tuesday, August 12, 2014

हां ,प्यार ही है जीवन का अर्थ

 क्या है अर्थ इन हवाओं का
इन हरे पेड़ों का
इस बहती नदी का
चहचहाती चिड़िया का
खुद मेरा
मेरे जीवन का
क्या  है अर्थ
कहा है ,कैसे है
बर्गलाओं मत
तुम्हे कसम है
मेरे प्रश्न को यूँ हवा में उछालो मत
हल ढूंढो
मैं क्यों जी रहा हूँ
क्या करने जी रहा हूँ
मेरे न जीने से क्या फर्क होगा
कुछ सवाल है जो मुझे अजीब भूलभुलैया में ले जाते है
मगर न जाने क्यों मेरे हर प्रश्न के  जवाब मे
तुम खड़ी मुस्कुराती दिखती हो
और मेरे सारे अँधेरे भाग जाते है
शायद हां ,प्यार ही  है जीवन  का अर्थ  ....................राकेश मूथा 

Friday, August 1, 2014

बारिश --1

बारिश --1

बादल है छाये 
उमस भी है 
हवा भी है ठहरी हुई 
बिजली भी चमकी है 
मोरे बोले है और नाचे है 
मगर बरसात कहा 
याद है 
झरती हुई आँख से 
तुम बिन बारिशें 
हो रही यूही
कई बरसों से .........राकेश मूथा

बारिश --2

बारिश --2
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सुबह से ही आलस मरोड़ रहे है बादल यहाँ मेरे शहर में आकर 
बतला रहे है कि रात खूब बरसाया मैंने पानी उसके गावं 
थक गया हूँ जरा सो लेने दो 
फिर जग कर जाऊँगा 
भर लाऊंगा तुम्हारे लिए भी पानी 
लौटूंगा जरूर अभी नींद लेने दो 
और हां सुनो बहुत नहायी वो 
छत पर खोलकर अपने लम्बे बाल 
और मैं देर तक नहलाता रहा 
सहलाता रहा उसे 
अब नींद में भी वो ही है मेरे
और मैं हूँ बेताब
फिर फिर जाकर बरसने
उसके गावं ................राकेश मूथा

Monday, July 28, 2014

ईदी

ईदी
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रमजान के सारे रोजे
तुम्हारे  नाम करता हूँ
आज ईद के दिन
 ये ईदी
 तेरे सरापे में
सितारों की तरह
लगाता हूँ
रमजान की सारी नमाज़ें
सारी दुवाएं तुम्हे देकर
अब मैं वज्जू करता हूँ
नयी नमाज के लिए .........राकेश मूथा

(ईद मुबारक ...आप सब स्वस्थ रहो ,प्रस्सन रहो ,आनंद करो )

Sunday, July 27, 2014

बदल रहा है समय

समय हंस रहा है
पल पल भर में छूटते जाते है
दर्द बिछुड़ने का
हंसी के पार्श्व में बजते संगीत सा
 नयी संवेदनाओ से भर
समय को
बदल रहा है
समय .................................राकेश मूथा 

Monday, July 21, 2014

प्रेम में ये कैसी दरार

प्रेम में क्यों दीखता है
उसके कुछ न होने का दर्द
वो  जो भी है मेरा है
कुछ हो न हो
मुझे  इससे क्या
मेरा प्रेम है
इतना काफी क्यों नहीं
शुरू प्रेम के दिनों के बाद
प्रेम जितना नहीं छाता
ये दर्द उससे ज्यादा मुझे सालता .
प्रेम में ये कैसी दरार .....राकेश मूथा