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Thursday, April 8, 2010

नोच नोच अपने समय को

एक किनारे पर खड़े हुए
दूसरे किनारे की तरफ नज़र डालता हूँ 
पानी ,अथाह पानी ...दूर होगा शायद तट
ऐसा मान खो जाता हूँ ...
उसी दुरी से  तो तुम आती हो
मुझसे चेट करने इंटरनेट पर
तब लगता है तुम यही हो मेरे  पास
इतनी वास्तविक कि
में सारा अपना दुखड़ा ,सारा अपना सुख
बाँट लेता हूँ तुम्हारे  संग
फिर ,अचानक जब कई घंटो ,कई दिनों
नहीं मिलती तुम मुझे
तब सागर के इस किनारे
आती जाती लहरों के बीच थपेड़े खाते
अपने ख्यालों के संग
पहुंचना चाहता हूँ-- तुम तक
मिलकर तुमसे -जीना चाहता हूँ कुछ पल
मगर कुछ नहीं होता ...
बीतते जाते है दिन महीने
जैसे नोचती है चिड़िया पेड़ के तने को अपनी चोंच  से
खोजती हुए अपने बच्चों को ,अपने प्यार को
में खोजता हूँ तुम्हें
नोच नोच अपने समय को
जाता हुआ अपने से दूर
कल्पनाओं के तारों में उलझता
खोते खोते  अपना वजूद
धरता हूँ ...तुम्हारा रूप ...