Search This Blog

Friday, April 2, 2010

या फिर .....

बाहिर जो  खड़ा है फटेहाल वो सत्य है
झूठ अट्टहास कर इंगित करते है उसकी दशा
बोतले खुलती है ,पायलों की खनक गूंजती है
समय हतप्रभ चुपचाप निरीह प्राणी सा
दिलासा देता है सत्य को ..
ये कोई नया द्रश्य नहीं ...ये तो होता है
इसमे क्या कला है ?
कोंसी वेदना है ?
ये सब कितनी बार दोहराया  जा चूका है
कई बार तो में खुद धकेल चूका हूँ
उस सत्य को जिसने -
मेरी सुविधाओं को  कम करने का बीड़ा उठाया
तब में झूठ के पक्ष था
आज अपनी सुविधाओं पर हुए आक्रमण के कारन
बचाव के लिए सत्य के पक्ष आकर खड़ा  हुआ हूँ
अब तुम ये बताओ - मेरे लीडर 
हम कुछ न करें
अपनी जिम्मेदारी को न निभाएं 
केवल अधिकारों  की मांग करे
भीड़ इकठी कर कैसे अपनी बात मनाएं ?
तभी तो हम यहाँ आयें है
अगर सच्चे  होते तो ??
तुम ज्यों सताए हुए होते ..फटेहाल
खड़े होते ..तुम्हारे साथ ...
झूठों की महफ़िल मुजरा देखने में
मशगूल है ...देर रात तक
बाहिर खड़ा खड़ा सत्य
सो गया है ..शायद
या फिर .....