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Sunday, September 20, 2009

जंगल के भीतर की आग

जब भड़कती है

फ़ैल जाता दावानल

फ़िर सदियों तक जलता है समय

धुंवा और लपटें

आकाश और धरती

दोनों तड़पते

सदियों तलक //

बुझ गए वो दावानल

मगर आँखें

दोनों की

अब भी मिली हुई है एक दूजे से

डरता है जंगल

न भड़के कोई शोला फ़िर ....////