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Friday, November 27, 2009

पहुँच जाता हूँ उस पार

अपेक्षाओं के समुन्द्र में
हिचकोले खाता मेरा प्यार
 कौन बचाए मुझे और क्यूँ बचाएं
अपेक्षाएं उफान  पर थी
उसने जब मुझसे प्यार का किया था इजहार
तब लगता था प्यार एक भावना है
जिसे न त्तो पहना जा सकता है
न ही बिछाया ,ओढा जा सकता है
और  भावना से भला कभी   पूंजीपति बना जा  सकता है ?

आज वही अपेक्षाएं बड़ी बड़ी लहरें बन मुझे तोड़ मरोड़ रही है
मैं बीच सागर से पुकारता हूँ उसे कातर निगाहों  से
और वो कूद पड़ती है बिना सोचे समझे
बीच भंवर मैं बचाने मुझे
और मैं  उसके प्यार की नाव से
पहुँच जाता हूँ उस पार //