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Monday, September 7, 2009

bhul

फूलों को अपनी झोली में भर रहा हूँ
और पहुंचे नहीं कोई
इस राह में शूल बिछा रहा हूँ
हँस रहे है दया से
झोली में पड़े-पड़े -रुआंसे फूल
मुझ पर
"अरे ,हमें बेचने से पहले
तुम खुद बिक गए मानव
अपने लोभ के जाल में फंसे तुम
भूल किये जाते हो
हमारा क्या
हम मिट जायेंगे
और मिटकर भी खुशबू फैला जायेंगे
मगर सोचो
जिस राह पर
तुम जो शूल बिछा रहे हो
वो सूख कर और नुकीले और जहरीले हो जायेंगे
और जो जख्म मानव को देंगे
वो
कभी नहीं भर पाएंगे "///////