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Tuesday, June 14, 2011

पाषण लोगो

गंगा के उदगम पर आज कुछ घटा है
अंतिम छोर की लहरें बहुत उदास हुई 
समां रही है अपने प्रिय के आलिंगन यू
जैसे अभी फूट फूट रोयेंगी 
मगर रोती नहीं 
वे कह्मोश नज़रों से देखती हुई आई है
अपने सभी किनारों को 
सभी मौज मस्ती में डूबे है 
कही कोई नहीं मिला जो नाम भी ले निगमानंद का 
निढाल हुई गंगा सागर में यू गिर  गयी है 
और लहरें भी शांत हुए जाती है 
उद्गम से अब गंगा नहीं आ रही 
वो तो शायद निगमानन्द के साथ गयी अब 
सिर्फ पानी आता है जो न आसू है ना कोई भाव 
 पाषाण हुई धरा पर बसते पाषण लोगो 
गंगा शायद अब वापिस शिव की जाता में जाने को है तयार 
रोक लो रोक लो उसे शायद बच जाए अपना कल अपना आज