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Saturday, August 13, 2011

अपने जन्मदिन पर

 में तिरसठ साल का हो गया
 मेने शायद ही कभी किसी दुसरे के बारे में सोचा
    मगर मेने हमेशा चाहा सब मेरे बारे सोचे 
 कुछ देने का मैं कैसे सोचता 
मुझे जब दिया ये घर 
  सब आज़ाद थे 
  बेहोश थे..झूमते अपनेपन के साथ 
टांगते खुदको मुझ पर 
  बना बैठे मुझे अनजाने में एक खूंटी 
 जिस पर जैसे तैसे लादता चल रहा हूँ 

     मैं अब भी हाँफते ,रेंगते बस चलता जा रहा हूँ
  और अब ये हालात है की 
  खूंटी हिलने लग रही है
     खूंटी पर टंगे लोग 
 लड़ रहे है 
    बिना कुछ दिए  सब पाने की आशा में
    अपने आज़ाद होने की दुहाई देते 
न जाने कब थकेंगे 
 हर बार में  
  अपने जन्मदिन  पर
  सोचता हूँ
  शायद अब हम आज़ादी का मतलब जान जायेंगे 
    शायद अब मेरे परिवार का प्रत्येक सदस्य 
 अपनी रचनात्मक सोच का इस्तेमाल कर
 हमारे घर को सुंदर बनाएगा ..............................................................................................................................जयहिन्द

2 comments:

  1. हर bar बस सोचते ही रह जाते हैं .सार्थक रचना .आभार

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  2. और सोच से आगे नही बढ पाते………सुन्दर अभिव्यक्ति।

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