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Friday, September 23, 2011

वो आते ही होंगे

उसकी बात्तों में पुराना घर है 
उसकी माँ है 
और है वे यादें 
जिनके सहारे वो आज के पुरुष को सोचती है 
ठीक वैसा ही घर ,ठीक वैसा ही ढांचा 
मगर पुरुष वो --पिता सा नहीं 
वो याद करती है उन उत्सवो को 
उन शामो को जब वो मिलती थी अपने आप से 
उन रिश्तो के बीच 
आज वो पहचान नहीं पाती खुदको 
कभी सोचती है वो कहा आ गयी 
कभी ये कि मेरी बिटिया भी क्या ये सब भोगेगी 
शाम होने आई है ..बहुत काम है 
कविता तुम ठहरो यही कल मिलती हूँ तुमसे 
या फिर सोचती हूँ काफी कुछ कह दिया है 
शायद बाकि कुछ जो बचा है 
समझ जायेंगे रसिक ...
तो अभी चलू ..वो आते ही होंगे .....