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Friday, September 11, 2009

बरसात बंद हो गई इस सावन में कहा आई
भाद्वों का महिना भी कम ही बरसा
सूखे है खेत
सुखी है नदिया
कुए ,तालाब ,नाडे,सारे पोखर
बिन पानी
अस्तित्वहीन केवल है बस
वो कहते है पेड काटें है तुमने
जंगल के जंगल जला दिए है तुमने अपनी हवस में
अब भुगतो अपने कारनामे
में कहता
सारे कुल्हाडे तुम्हारे
लकड़हारे तुम्हारे
लकडियों के कारखाने तुम्हारे
और उस पर
ये तुर्रा सा भाषण
सुनकर
अपनी भावनाओं की बदली में
दिन धोले सूरज ज्यों
मुह छुपा लेता हूँ ////