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Monday, September 7, 2009

मकान

बहुत हुआ
बहुत रह लिए इस मकान
चलो छोड़ इसे
जा रहें किसी और मकान
ढूढने निकलते है
पसंद नहीं आता
थके हारे जब लौटते है
तब गहरी नींद सुलाता --यही मकान
जिसे हम छोड़ने चले थे
वही गौद में ले हमे
देता थपकियाँ
गहरी नींद से हम उचक
देखते अपना शरीर
और इस मकान को
और हो जाते विलीन
नींद बहुत गहरी, बहुत लम्बी
जिसकी जाग अब शायद ही हो ........