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Friday, October 9, 2009

सम्भंधी के जंगल में

संबंधो के जंगल में

पीले झर्झेर हुए पत्तों ज्यों

बिखरी पड़ी भावनाएं

कुचली जाती है हर पल

हर पल झरती है

कोमलता ,प्रेम से भरी इच्छाएं

अंधेरों में फुसफुसाहट होती है

आंसू अब कहा

लहू टपकता है

जब अट्टहास उसका

उडाता है मेरे समय का मजाक

अब में सिसकती नही

नही करती सिकायत

सहन करती हूँ

अपने को रोकती हूँ

कही में न बन जाऊँ

उसके जैसी जंगली

और भूल बैठू अपनी सभ्यता

जानती हूँ में

की वो यही चाहता है

की में भी बन जाऊँ उस जैसी

मगर नही में प्यार हूँ

कोमल हूँ

विश्वास हूँ

हूँ एक सभ्यता

जो रहूंगी हर दम ......