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Wednesday, October 14, 2009

एक खिले फूल की तरह

वक्त बदलते देर कहा लगती
कुछ देर पहिले का ठहाका
बदल जाता है जीवन भर के रूदन में
जो जीवित होते थे वे स्मर्तियों में बदल जाते है
शोर सन्नाटे का रूप धर
ताकता है टुकुर टुकुर
सब कुछ बदल जाता है
अब छोडो इसे
ये कहा हमारे नियंत्रण में
हम जो कर सकते है
वो करें
खुल कर करें प्यार
अपने आप से
और करें वो काम जो मिला है
उसे मुस्तेदी से
इस खूबी से की
बिखरे हमारी सुगंध
और रह सकें हम
अपने बाद
उनकी स्मर्तियों में
एक खिले फूल की तरह ........