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Friday, October 23, 2009

जमेगी फ़िर बर्फ

जितना चुप और मौन है ये बर्फ का मैदान
उतनी ही चुप चाप बह रही है बर्फ को चीर ये नदी
बढ़ता जाता है पाट इसका पल पल
गिरती जा रही है बर्फ
पिघलते जाते है ग्लेशियर
समद्र और उंचा और उंचा
होता जाता है
डूबती जा रही है बस्तियां
भीषण गर्मियों से बढ़ता तापमान
लीलता जाता है
कभी तूफ़ान में ,कभी भूकंप, कभी बाढ़ में ,कभी सूखे में
नेस्तनाबूद होती जाती है जिंदगिया
और हम बेखबर
अब भी काटते है पेड
खोदते है धरती
बनाते है बम्ब

वो सब करते है जिससे
हमारा आज चमन हो
कल की परवाह कौन करे
आज भरें जेब
चाहे आज के कर्म से
बरबाद हो भविष्य
हमारी आने वाली पीढियों का
और चाहे ख़ुद हम पायें कल कष्ट

तब कैसे रुके
ग्लोबल वार्मिंग
चाहे लाख करो सम्मेलन
गोल करों मेज

सब कुछ बदलेगा
अगर तुम
बदलो अपने को
अपने से इतर करो प्यार औरों से
ठहरो रूको समजो
विचार करो
अपने को कुछ समय दो
तब ही तापमान कम होगा
जमेगी फ़िर बर्फ
और बजेगी फ़िर
बंसी चैन की....///////


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