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Sunday, December 20, 2009

जड़ें सब देख रही है

नए बरस की पहली सुबह
पुराने बरसों का पानी
खिला है मुझ पर फूल बन

जिन पर छाई है पुराने बरस की यादें
तितलियाँ बन
छूती मेरे फूलों को
मेरे हरे को

और खोजती मुझमें  वो पौधा
जिस पर हुई थी वो मोहित
ढूंढती अपने निशान
जो समय के साथ
तने की छाल के भीतर खो गए है कही

जड़ें सब देख रही है

 जमा रही है अपने पाँव
और भीतर ,और भीतर
अपनी शिराओं को
मिला रही है नदी की शिराओं से
पुराने पानी को मिला रही अपने में
जड़ें चाहती है 
समय  रहे --हमेशा  --
हरा ...///////

4 comments:

  1. बहुत ग़ज़ब के ख्यालात हैं ...... लाजवाब रचना की उपज हुई है जड़ों से .........

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  2. दिगम्बर नासवा
    dhanyawad ..apka bahut bahut dhanyawad.....honsla afzai ke liye ..achaa laga sriman

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  3. जमा रही है अपने पाँव
    और भीतर ,और भीतर
    अपनी शिराओं को
    मिला रही है नदी की शिराओं से
    पुराने पानी को मिला रही अपने में
    जड़ें चाहती है
    समय रहे --हमेशा --
    हरा ...///////
    Bahut hee hridayasparshee kavita---hardik badhai.

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  4. jarokha
    bahut dhanyawad ..aapke padhne se v pratikirya dene se meri kavyyatra mein taajgi aati hai ...aabhar

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