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Monday, December 21, 2009

सब कुछ सफ़ेद हुआ जाता है

सब कुछ सफ़ेद हुआ जाता है
ढका  जाता है
उस पानी की याद से
जो कभी बहता था
नदी में ,समुद्र में
अब
हुआ है सफ़ेद
न जाने किस डर  से ,किस गम से
या फिर रूठ गया है
बदल कर रूप
फिर भी वो बदला कहाँ ?
होकर सफ़ेद, फिर भी --
उसने अपना रंग- ये बदला  कहा
कुछ देर बाद मान जायेगा
अपने सारे गम ,अपने सारे डर
अपने सारे शिकवे गिले भूल
बहेगा फिर वो
नदी में ,समुद्र में
पानी अपना प्रेम ,अपना राग ,अपना मूल स्वभाव
कभी --कहाँ  भूलता ?
फिर, पीकर वही पानी
क्यूँ   बदल जाते तुम ?
क्यूँ बदल जाता मैं ?