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Wednesday, January 20, 2010

छट जाती है धुंध

धुंध में खोया है रास्ता
जहा में हूँ वहा  से आगे बस धुंवा है
कुछ दूरी पे खडी वह भी यही कहती है
दोनों कुछ कदम बढ़ते है
धुंध और बढती है
हर समय खोये वो धुवें में
न जाने कब एक दुसरे से कर लेते प्यार
सूरज की किरने धीरे धीरे पसारने लगती है अपनी रौशनी
छट जाती है धुंध ,अब चेहरे साफ़ दीखते है
प्यार धुंध से हुए ओस के माफिक टपक कर
छोड़ जाता है अपने निशान
कोहरे में खोये रास्ते साफ़ बताते है
कि दोनों के रास्ते अलग है
एक नहीं ,वे कभी हमसफ़र थे नहीं
अब है नहीं .......

7 comments:

  1. सुंदर अभिव्‍यक्ति !!

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  2. बेहतरीन अभिव्यक्ति!!

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  3. प्यार धुंध से हुए ओस के माफिक टपक कर
    छोड़ जाता है अपने निशान
    कोहरे में खोये रास्ते साफ़ बताते है
    कि दोनों के रास्ते अलग है
    बेहद कोमल एहसास ......रस्ते अलग होने की कसक .....क्या कुछ नहीं है इन पंक्तियों में.......
    regards

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  4. अच्छी रचना , बधाई

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  5. This comment has been removed by the author.

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  6. धुंध छटी
    कोहरा हटा
    दोनों के चेहरे साफ़ दिखाई देने लगे
    जो प्यार उसके चेहरे पर देखने को तरस रही थी
    वो नहीं मिला
    चेहरे पर केवल उदासीनता के भाव थे
    मानो कह रहे हों
    कि तुम्हारे प्यार के बदले में देने के लिए
    मेरे पास प्यार नहीं
    मैं तो केवल कुछ दूर चल पड़ा था तुम्हारे साथ
    केवल एक मित्र कि तरह
    मैं तो तुम्हारा वो हमसफ़र नहीं
    जिसकी तुम्हे तलाश है
    मैं तो कुछ दूर साथ चला था
    सिर्फ तुम्हारे सफ़र को आसान करने के लिए
    अब तुम्हारे मेरे रास्ते अलग हैं
    क्योंकि मैं तुम्हारा वो प्यार नहीं
    जिसकी तुम्हे तलाश है!!!!!!!!!

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