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Wednesday, February 3, 2010

मेरा मिटना ही तय करेगा

पहाड़ से झर कर बर्फ मैदान तक आई है
हरियाली सब ओर छाई है
पहाड़ को देख नदी देखो कैसे शरमाई है 
मुड मुड कर देखे जाती है
और तेज और तेज बही जाती है
कल कल करती मुझे कहे जाती है 
जानती हूँ  फिर मिलूंगी उससे
रहूंगी उसके संग
और पहाड़ से करके प्रसंग
बहुँगी अनवरत
अभी तो मिट जाऊं
महासागर में मिल जाऊं
मेरा मिटना ही तय करेगा
मेरा होते रहना ......