Search This Blog

Monday, February 15, 2010

मैं ही चोंक गया हूँ खुद को पाकर .....

उसके  रूप मैं कब डूब 
 खुद का चेहरा तक भूल गया
खुदके बारे मैं सोचना भूल गया
फिर ये कैसे सोचता कि
इस प्यार के सरोवर से निकल  कभी  
तेज रश्मियों से लिपट झुलसना भी पडेगा
पावँ इस सख्त जमीन पर रखना भी पड़ेगा
यू निपट अपने को इस वीराने मैं देख
खुद ही खुद से पूछना भी पडेगा
कैसे हुआ ये सब ?
बार बार सवाल कर उत्तर  की खोज मैं
बदहोश भटकना भी  पडेगा
प्यार का सरोवर
निरपेक्ष अब भी बह रहा है
मैं ही चोंक गया हूँ खुद को पाकर .....