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Sunday, March 7, 2010

वो जिसके होने से में हो पाया

वो जिसके होने से में हो पाया
रातों  को जाग  जाग  कर जिसने मुझे सुलाया
खुद नहीं खाया मगर मुझे खिलाया
कंपकपाती ठण्ड में भी मुझे ओढाया
मुझे  बहलाने  को उसने असंख्य  बार
कवितायेँ सुनाई,लोरी गाई उसने
मुझे सहलाया ,चलना सिखाया
आकाश ,चाँद ,तारे ,सूरज ,
पेड़, पौधे, फूल, कांटे
चिड़िया ,घोंश्ले 
धरती, सागर ,बादल ,बारिश
हवा ,तूफ़ान,बर्फ ,
सारी बातें उसने बताई
मैं जितना भी जान पाया
माँ तुमने ही बताया
फिर बहिन ने स्नेह के झरने से मुझे नहलाया
 नानी ,दादी ,चाची ,मासी
की गोद खेल खेल जीवन के रहस्यों को पाया
दोस्त बन उसने मुझे सिखाया
प्यार की नदी के संग चल चल यहाँ तुम तक आया
पत्नी को पाकर मेने नया  संसार रचाया
पिता बन मेने जाना
अपने होने का नया अर्थ तुमसे ही मेने पहचाना
आज कल परसों ...बरसों ...कई जन्मों
में कैसे भूलू ...महिला ...
तुम्हरे होने से है ये संसार
तुम हो तो है जीने का सार
फिर कैसे भला दिवस केवल एक हो तुम्हारा
तुम हो हर दिवस, हर पल, हर क्षण
मेरी हर सांस
महिला की दी हुई  है उधार
अगले  जनम महिला बन भी न  चूका पाऊं
 शायद ये उधार .....

(ये कविता है या मेरे उदगार ,भाव जो भी है समर्पित है माँ ,दादी नानी,चची,मासी ,बहिन ,दोस्त ,पत्नी ...सभी रिश्तों को सजाने वाली घर बनाने वाली महिला को ..जिनके होने से में हूँ ...जिनके होने से में जान पाया ये संसार ..उनको ..महिला दीवस के बहाने ...उनके लिए नहीं मुझ पुरुष के लिए लिखी है ताकि  ये भाव पुरुष में और गहरे तक गुंझे और गूंजता रहे ..)