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Monday, March 22, 2010

आज इतना जल बचायेंगे

विश्व है जल मग्न
मगर प्यासा है
सामने है जल मगर वो मल मिला है
फैला है समुन्द्र मगर जल खारा है
गाँव में जगह जगह खेत पर चल रहे नलकूप है
पानी की टंकी भेरने वाला नलकूप सुखा है
बावड़ियाँ  है ,झालरे है ,कुवा है
मगर उन पर अब कब्ज़ा है
नहरों ,नदियों को बनाया हमने नाला है
बरसाती नदियों के रास्ते खानें बनी है
कही हमारे महल शानदार  खड़े है
पीने का पाइप घर में
घर से निकल  रहे पाखाने की होदी से निकल
पूरी कालोनी को मल पिलाता है
जो चीज सबसे ज्यादा हमें चाहिए जीने के लिए
उसके बारे में न जाने क्यों हम बेपरवाह इतने है
विश्व जल दिवस है आज
इसी बहाने सोचें कैसे करे हम साफ़ अपने पानी को
बरसात के पानी को कैसे बचाए
अगली बरसात तक
अपने शहर की बावडियों ,झालरों ,कुवों ,नहरों का पानी  कैसे ले ज्यादा से ज्यादा काम,इस पर जरा सोचें
क्यूँ पम्प  चलाये
बिजली इतनी जलाएं
पाइपों का जाल बीछायें
क्यों न सामदायिक शोचालय ,स्नानघर बनाये
हर घर के बरसात के पानी से अपने शहर का  तालाब बनायें
अभी शायद हंसोगे आप
-- करता है ये कवि व्यर्थ की चिंता...
ऐसा न हो आने वाला कल हमारा
पानी पानी चिल्ला चिल्ला प्यासा ही जान गवाएं
मत रहो दूर इस विषय से
अपने को अलग समझ बेपरवाह न होना अब
जहा भी व्यर्थ पानी गिरे
वहा अपना समय लगाएं ..पानी बचाएं
पानी साफ़ रखे .पानी किफ़ायत से काम लें .......
आज इतना पानी बचाएं
कि अपना कल कभी प्यासा न रहे
आओ शपथ  ले हम
खुद समझेंगे कीमत पानी क़ी
और समझायेंगे औरों को भी कीमत पानी क़ी