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Saturday, March 27, 2010

कविता ,तुम ही तो मिलाती हो

रात के अंधेरों में
सन्नाटों की साय साय
मन में उठती है हाय हाय
कहा हो, कहा हो ?
पुकारता ,खोजता
में मिल जाता हूँ खुदसे अक्सर
तब नींद गहरी आती है
सुबह भी चहकती है
और नहीं मिल पाता जब खुद से
तब खीज से भरा भरा
थका हारा
मिल लेता हूँ तुमसे
कविता ,तुम ही तो मिलाती हो
मुझे खुद से !