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Saturday, April 17, 2010

कोरी एक काया

वो आये  नहीं फिर
राह  तकते तकते पत्थर हुई  थी कभी   अहिल्या
मैं तो  भूल गयी पत्थर  होना भी
ढांचा होकर रह गयी आज
रक्त मांस की  निर्जीव पुतली
सांस भीतर  लेती
बाहिर करती
मशीन ज्यों ....
भावहीन चेहरे की रेखाओं में डूब गए वो  दिन
जब भाव खिले थे फूल की मानिंद
जिसकी महक से मैं  सुवासित हुई  थी
न जाने कैसी आई वो  हवा
जो उड़ा  ले चली
महक मेरी
फूल मेरा..
अब मैं  ....हूँ
सांस लेती
बाहिर  निकालती
कोरी एक काया ......