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Friday, May 21, 2010

दोपहर.....

दोपहर
बाल खोले
खुद से बतियाती ,फिर
घर के सूने आँगन
गुनगुनाती है
चौखट  झूमती है
खिड़की , दरवाजे
फर्श और छतें...दीवारे
सब नाचते है
वो है 
घर की मालकिन
दोपहर.....