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Thursday, June 3, 2010

मेह की बाट ....

पहली बरसात से पांखों के
भीतर ...तक
बूँदें  जा  ठहरी

झटक कर  चिड़िया
मार मार चोंचे
पंखों पर  
सूखाती
वो  बरसात  ...
फिर ....निहारती  आकाश
शायद ...आज आयें वे
जाऊं 
जाकर  सजा लूँ
घोंसला  
बिछाकर नर्म नर्म हरी घास
टकटकी लगाकर देखूं उनकी राह 
बिछा कर जैसे बालू
रेगिस्तान जोहता पूरे सावन
मेह की बाट ....


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