Search This Blog

Sunday, June 20, 2010

पिता...........

पिता जब भी आते
विश्वास आता, ताक़त आती
अजनबी शहर की गलियों
घूमता मैं ऐसे जैसे मेरे हाथ शहर की सत्ता आती
जरूरतों को मुझे कभी शब्द न देने पड़े
दुनिया में मुझे कभी सहारे न लेने पड़े
पिता आज भी तुम मुस्कुराते
मेरे समय को देते हो मधुर राग
गीतों को मेरे देते तुम भाषा विराट
पिता तेरे पास
दुनिया ये सिमटी सिमटी हो जाती
तेरी नज़रों से मेरी नज़रों में सिमट जाती है
यों गिरते पड़ते चलते तेरे साथ
तेरे नाम के साये
मैं आज लिखता हूँ मेरा भी एक नाम
हूँ तेरी परछाई.. तेरे आगे पीछे चलता हूँ
मेरे आसमान को तेरी धरती करता हूँ
जैसे सूरज के आगे टिमटिमाता संसार
में भी तेरी रौशनी से होता आलोकित
आकाश का एक तारा बनता हूँ
पिता ...
लिया है मेने कितना कुछ तुझसे
एक और आशीष देना मुझे
मैं भी अपने बच्चों का
बन पाऊं
तुझसा
पिता...........

No comments:

Post a Comment