Search This Blog

Wednesday, June 30, 2010

संन्यास

उसको खोला ,टटोला
खुलने के बाद जो बंद थे रास्ते
उनके अवरोध हटाये
यों खोलता ..टटोलता ..खोजता
अब भी खड़ा हूँ
किसी बंद रास्ते के बाहिर
और जितना खोजता हूँ
उतना ही उलझता  जाता हूँ
छोर कोई मिलता नहीं
रहस्य  कभी सुलझता नहीं
और जब कोई कहता है
व्यर्थ ढूंढते हो
देखो इसमे रहस्य जैसा कुछ भी तो नहीं
तब हैरान उसे देखता हूँ
और बजाय खुश होने के
उदासियों के पहाडो पर
किसी सन्यासी सा
किसी गुफा के अँधेरे
खोता अपना आप ...रहता हूँ