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Friday, August 13, 2010

मनोदशा :कोशिस एक कविता लिखने की

मनोदशा :कोशिस एक कविता लिखने की



कहा से आये है --कहा जायेंगे
कल क्या होगा
कल क्या हुआ था
ये गुस्सा क्यूँ आया
प्यार कैसे उपजा
आशा कैसे जगी
निराशा क्यों छाई
ये रास्ता कब बना
कब नदी सूख
भीतर समां गयी
कब यहाँ पानी फिर से निकला
चाँद कहा गया
सूरज कहा से आया
आकाश स्थिर हमेशा क्या देखता
पहाड़ पानी पानी हो   क्यों भर देते झीलों को
अँधेरे रौशनी के गायब होते ही कहा से आ टपकते
और रौशनी के आते ही कहाँ चले जाते
मन पंछियों सा गोते लगता आकाश का  कोना कोना छान आता
तुमसे दूर  तुम्हे याद करता
तुम्हारे पास क्यों हो जाता उदास
दिन रात गुजरते  है
उम्र बढती जाती
मगर कही कोई ठोर
कही कोई ठिकाना ऐसा नहीं मिलता
जहा आत्मा हँसे मन हँसे शरीर भी
इन तीनो का मेल कभी हो नहीं पाया
लिख लिख शब्दों को व्यर्थ मैं
कविता करने की कोसिस में
रोज करता   जाता पाप
शब्द  हँसते ..भाषा दुखी होती
मन की बैचनी भी नहीं मिटती
में कुछ पल और बूढा होता
हाफ्ने लगता हूँ
सीढियाँ  उतरनी है अब
उतार पर .....सागर के भाटे के साथ
मन में लिए ज्वार ...में हूँ अब भी यहाँ ......