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Saturday, October 30, 2010

कोई हो गया मुझमें

सागर की गूंज की तरह
मन में उठता है शोर
निर्जन  स्थानों में अकेले
बाते करता हूँ
कभी दौड़ता हूँ
अपनी ही परछाई को पकड़ने
कभी चुप चाप..
सुनता  हूँ खुदको
समय अब  चोंकता नहीं मुझे देख
वह भी खिलखिलाता है मेरे साथ
होता उदास
चुप चाप
कोई हो गया मुझमें
और मैं न जाने कब रह गया सिर्फ
साया उसका
समय ने मुझसे पहिले जाना ये सब ....
तभी शायद वो मेरी हर  हरक़त
मेरे साथ है !