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Wednesday, December 15, 2010

कभी जान न पाए

सपनो की सडको पर
ख्वाबों  के पेड़ो के झुरमुटें मैं
तुम और मैं
एक दूसरे के सायों को पहिने हुए 
न जाने कब खो गए थे
बड़ी लम्बी नींद थी रंगीन सपने थे
कभी जान न पाए
कौन कहता है कौन सुनता है
सब  खुसफुसाहटें
थी जैसे चिड़िया की चहचहाटें
कभी वो न थी कभी मैं न था
नींद थी सपने थे खवाब थे
आज अचानक जाग हुई है
मेरी रात सूरज की किरणों मैं राख हुई है
और  इतने सालों बाद
आज अचानक फिर  मेरे जीवन "मैं" आया
हम पीछे छूटा.........न  जाने कैसे ...न जाने कब
ये रिश्ते कैसे बनते ..कैसे बिगड़ते
इनका गणित कभी कोई जान न पाया .....