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Friday, December 31, 2010

आता जाता समय

फिसलती रेत को देख रहे है
जो कुछ हाथ मैं है उसे
हाथ से जाते हुए देख रहे है
जिसे  आते हुए देखा था
उसे जाते हुए देखना
 एक सिहरन छोड़ जाता है
उसके होने से जो कुछ संभव हुआ
उसके नहीं होने से  जो कुछ अब नहीं होगा
वो बहुत कुछ सिखा गया  है
उसका नहीं होना छोड़ गया  है ..धोड़ा अवसाद ,धोड़ी निराशा
और उसके होने से जागी है   .. उमंगें ,  आँखों मैं चमके है नए सपने 
,  आँखों मैं चमके है नए सपने
संस्कार  दिया है  ऐसा उसने
--  उसका जाना लगता है  स्वाभाविक 
एक प्रक्रिया सा ..सामान्य सी एक प्रक्रिया सा

यूँ आता जाता  समय
.हमें तरो  ताजा रखता है ....