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Tuesday, February 8, 2011

.लगाता ठहाके उनके साथ ...

कभी सब खुश नहीं हो पाते
बड़ी मित्र मंडली मैं
ऐसा होने लगता है
कि जब कोई दो मिल बैठते है
तो अपने मित्रों की ही करते है बुराइयाँ
उनसे उपजी शिकायतों  से 
धीरे धीरे मंडली मैं बन जाते है खेमे 
और जो प्रबल विरोधी मित्र होते है
वे दिखा दिखा सबको
आपस मैं मिलते है ठहाके लगा लगा
ये क्या हाल हुआ?
क्यों नहीं
 मित्र रह सकते  ....बिंदास ,सहज, भरोसेमंद
क्या जरुरत हो गयी
मित्रो मैं भी राजनीती की??
उत्तर मैने खोजा ...
और हर बार मित्रों की राजनीती का
शिकार हो ...अब अनुतरित हूँ ...
हूँ ...बिना किसी प्रश्न के
लगाता ठहाके उनके साथ ...