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Thursday, February 24, 2011

ये समय मुझ पर छोड़ जाएगा निशाँ ऐसा

रेत की मानिंद खाली कर जाती है कोई सूचना
एक पल में वीराना कर जाती है  
भौचक हुए समय में 
फिर दुःख के लबादे में दुबके शरीर को
  धड़कन  सुनने का समय भी नहीं  मिलता 
उहा-पोह में फंसे  और हाँफते---
----बिलखने को तयार 
इस समय में भी 
मेरी मुठियाँ-
तुम्हारी याद को कस कर पकडे रहती है  
मेरी हर धड़कन
तुम्हे खुद का हाल बताने को बेताब रहती है 
जानता हूँ तुम नहीं सुनती हो न सुनोगी ...
मगर मुझे पता है
शायद 
अब फिर में कभी तुम्हे याद न कर पाउँगा 
ये समय मुझ पर छोड़ जाएगा  निशाँ ऐसा 
जिसकी छाया में दुबका मैं 
फिर  कभी ..तुमसे क्या 
खुद से भी न मिल पाउँगा .......





 



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