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Thursday, March 3, 2011

है इसी पीले की आभा

 कई रंग 
आये बिखेर गए अपनी आभा
हवा के संग 
कई बार संसार हुआ   इनसे सराबोर 
 कभी उनके रंग रंगा नहीं

मगर ये एक रंग
सब रंगों में रखता अपनी अलग  छाप 
अपनी आभा से पहचाना जाता 
सब रंगों को अपने रंग में रंगता
है ये  रंग --- पीला भुरभुरा होते मुरझाये  पात का
जो  बिखेरता है उदासी 
जो  छोड़ता है निराशा 
मगर 
हर 
फूल की खिलन में
हर 
पात के हरे में
है इसी  पीले की आभा 
जो 
हमारी दुनिया को रंगीन बना देती  है ..