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Friday, May 20, 2011

झांकती रहती है


वो
उन्मुक्त करती है 
शब्दों को 
देती है पूर्ण आकार 
जैसे चित्र गुजरता  है
आँखों के सामने से 
कविता मैं सुनता हूँ ..देखता हूँ 
और जिधर  वो ले जाती है
उसके साथ चल पड़ता हूँ 
साथ उसका 
जहा खतम होता है 
उस जगह वो मुझे 
अकेला करके  नहीं जाती 
मुझमे हो जाती है 
फिर
झांकती  रहती है
मुझमे से 
हमेशा .....