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Sunday, May 29, 2011

पूछता अब कविता से

चिड़िया आज बहुत दिनों बाद तेरी याद आई 
जब देखा मैंने सुबह सुबह पेड़ को अकेला 
और नहीं सुना तुम्हारा मधुर गान 
कुछ देर अचकचाया ,सोच मैं पडा 
और दिखी मुझे बिल्ली पेड़ को ताकती 
सिहरते पत्तों ने मुझे सब समझाया 
मैंने बिल्ली तुझे इतना दूध पिलाया 
फिर भी तू ..........और सुबह से 
न जाने कितने झुंड के झुंड चिड़िया के आये  है और आते  जा रहें  है 
कितने ही पत्ते पेड़ से झरे है और झरते ही जा रहे है 
कोई मुझे कुछ कहता नहीं 
बिल्ली भी दरवाजे पे भूखी खड़ी 
बार बार पंजो से दरवाजे को नोचती है 
वो भी कुछ नहीं कहती
मगर फिर भी मैं सुन रहा हूँ
उन सबकी आवाजें  ..सबकी शिकायते 
सोचता हुआ चुपचाप 
पूछता अब कविता से 
कैसे चिड़िया फिर आये मेरे द्वार 
झूमे पत्तें  फिर 
और बिल्ली भी रहे न भूखी .....