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Sunday, May 29, 2011

अब पहुँचने वाला हूँ कगार

अब मुझे नहीं लगता कल आयेगा 
समय नहीं है हर समय अब यही लगता 
लिख लिख अब फाड़ता नहीं 
जो लिख गया वही अमर रहता 
सोचने व् फाड़ने व् टालने का समय नहीं अब 
कितना सोया रहा ..कितना चलता रहा 
कभी अपने छालों से कभी अपने पावों से नहीं किया प्यार 
अब पहुँचने वाला हूँ कगार 
बस विसर्जन को हूँ तयार 
तब क्यों सोचू, क्या अब सोचू
हूँ जैसा पहुंचुं  तुम तक 
और दे दू अपना सब कुछ 
क्यों रुखु बचा कर  कुछ भी अपने पास 
देता हूँ जो लिया मेने तुम सबसे अपार 
सागर  भी करता हर नदी को स्वीकार
मुझे पता है तुम भी 
करोगे मुझे  स्वीकार
दोगे -- मुझे अब अपना  रूप विराट ....