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Saturday, June 4, 2011

बालोतरा तुम याद आओगे मुझे

बहुत संघर्षो के बाद 
आज आया है वो दिन
 जब आई है फिर ठंडी बयार 
मुक्ति मिली है उस एक अजीब यात्रा से 
जो निचोड़ लेती थी 
सारी उर्जा
थका देती थी 
बदन के रोये रोये में 
भर देती थी दर्द अपार
मैं  रोज चढ़ती  थी एवरेस्ट पहाड़ 
और झरने की माफिक पहाड़ो से टकरा टकरा 
होकर निढाल आ पड़ती थी घर 
एक रात के पड़ाव के बाद फिर चल पड़ती थी
अनवरत यात्रा का वो दुर्दिन अनुभव 
कितना कुछ सीखा गया 
जीवन को दे गया नया साहस नया  विश्वास 
और आज मिली मुक्ति तो 
बहुत ख़ुशी के साथ 
बहुत पीड़ा हुई मुझे आज 
छोड़ते हुए  उन लोगो का साथ 
याद आये मुझे फिर 
मुझे  मेरी  माँ पापा और बड़ी मम्मी 
जिनको खोया है मेने इस संघर्ष के दौरान 
और याद आये वो दोस्त जो मुझे मिले ऐसे 
जिनका साथ स्नेह मिलता रहेगा 
मुझे अब जीवन  के हर घाट
सच ....संघर्ष से तप  कर ही हासिल होता है घर 
और ख़ुशी मिलती है अपार 
बालोतरा तुम याद आओगे मुझे 
मेरी थकानो  में नहीं 
मेरी मुस्कानों  में रहोगे तुम मेरे साथ 
गयी थी जब अकेली गयी थी 
और आज जब लौटी हूँ अपने घर तो
मैं ले आई कितनो को अपने साथ//

(पत्नी मंजू के बालोतरा से पुनः जोधपुर आने पर उनकी जुबान से लिखी ये कविता उन्हें भैट )