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Saturday, July 30, 2011

हंसा पहाड़

पहाड़ पर खड़े 
पहाड़ से ऊँचा होते 
अपने कद पर इतराए 
पहाड़ से उतर 
अपने बोने होने के अहसास पर शर्माए 
हंसा पहाड़ 
अरे घुमक्कड़
तुम  कितना घूमे 
मैं यही  था ...यही रहूंगा 
मैं तो अपने थिर होने पर न तो शर्माता ..न ही इतराता 
जो मिला मुझे उसको संभालता 
अपने पर गर्व करता 
दूजो को उनकी जगह देता 
और तुम जीत कर भी मुझको 
यूँ सोच सोच ..हार जाते हो !!