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Saturday, January 21, 2012

ये पाट नदी का

विरह की धुंध से निकल 
मिलन की उजली सुबह 
पहुँच ही गया जल 
फिर नदी में कलकल 
छलछल नाचता फांदता 
अपने उदगम से यू निसरता
जैसे सितार से ,किसी बांसुरी से 
उस्ताद के तबले से 
कुमार गन्धर्व के मुह से 
निसरती हो राग
जानता है  वाध्य  यन्त्र  
जानता है गायक 
ये राग फिर बिछोह की ओर 
ले जायेगी  फिर सिमटेगी ये राग 
यन्त्र में ,गले में क़ैद हो जायेंगे 
फिर ये सुर ..खतम हो जाएगा ये गान 
बचेगा झनझनाता ,कंपकंपाता ये समय 
संवेदनाओं को जगाता 
ये नदी भी जानती है 
समां जायेगी फिर समद्र में 
रह जाएगा रह रह आहें भरता ठंडी 
ये पाट नदी का ......

2 टिप्पणियाँ:

  1. बहुत बढिया रचना है बधाई।

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  2. सुन्दर भाव। शुभकामनायें।

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