Search This Blog

Monday, January 30, 2012

खूब निभाया उसने

सब कुछ गणित के सूत्रों की तरह तयशुदा था 
पता था की गुना ,भाग ,जोड़ ..करके कई देर बाद 
कब खुदको घटा देना है इस समीकरण से 
प्रेम की प्रमेय का ये अद्भुत ज्ञान 
उसको अपनी विरासत में मिला था 
जिसे खूब निभाया उसने 
अद्भुत  गणित था उसका 
अपनी विरासत को वो नयी प्रमेय दे गयी 
जिसको पाय्थोगोरस भी सुलझा नहीं पाता
 अब जब सब कुछ झुलस गया है 
एक अद्भुत सन्नाटे में विद्यार्थी हस रहा है 
खुद पर ...आन्सुवों के समुंदर में डूबा उसका चेहरा 
अब शायद निकाले बाहिर
उसको उलझनों से ,अवसाद से 
हाँ ,शायद--- अब वो पहचान गया है 
कहाँ , क्या--किसे  समझने में उससे भूल हुई  थी ....